सोमवार, 30 सितंबर 2013

Cast your vote,Don't vote your caste



भारत में वैसे तो कई कुप्रथाओं का जन्म हुआ। लेकिन जो प्रथा अभी तक अपनी जड़ें जमाये हुए है,वह है जाति प्रथा। समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव है तो वह सिर्फ जाति प्रथा के कारण। यदि भारत में समानता लानी है तो जाति प्रथा को समाप्त करना अति आवश्यक है। यह हमारी सोच को सीमित कर देती है। जिससे हम ऊपर नहीं उठ पाते। इसी के कारण दूसरी जाति में विवाह करने वाले युवक एवं युवती अपने ही घर वालों द्वारा मार दिए जाते हैं। या कुछ विशेष जाति वाले लोग आरक्षण की सुविधा का लाभ उठाकर ऊंचे पदों पर बैठ जाते हैं। इससे अन्य जाति वर्ग के लोग अपने को उपेक्षित समझने लगते हैं और देश का गरीब वर्ग इससे अछूता ही रह जाता है। अर्थात इनकी घोर अपेक्षा होती है। यंहा बात आरक्षण की नहीं,बल्कि जाति की है।यदि आरक्षण दिया भी जाता है तो उसका आधार जातीय नहीं होना चाहिए।यह जाति प्रथा को ख़त्म नहीं होने देगा। आरक्षण का आधार जातीय न होकर ज़रूरत होना चाहिए। यदि गरीबों को आरक्षण की सुविधा प्रदान की जाती है तो इसमें किसी भी जाति की उपेक्षा नहीं होगी .
                                     मान लीजिये यदि एक आरक्षित वर्ग का व्यक्ति आरक्षण का लाभ उठाकर भारतीय सिविल सेवा में उच्च पद पर आसीन हो जाता है तो वह और उसका परिवार समाज की मुख्यधारा से जुड़ जाता है। तो अब उसके वंशज को किस आधार पर आरक्षण की सुविधा का लाभ मिलना चाहिए। जातीय आधार पर..? क्यों? अब तो वह सोसाइटी की मेनस्ट्रीम से जुड़ चुका है। संविधान निर्माता डॉ. बी.आर.अम्बेडकर ने भी संविधान में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए रखी थी कि पिछड़ी जातियों को समाज की अन्य जातियों के स्तर पर लाया जा सके। जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था जाति प्रथा को हमेशा जिंदा रखेगा। जाति प्रथा को समाप्त करने के लिए अंतर्जातीय विवाह करने वालों को नकद उपहार या सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जा सकती है। जातिवाद इतना हावी हो चुका है कि आजकल 'कास्ट योर वोट' की जगह 'वोट योर कास्ट' का नारा दिया जाने लगा है।  

सोमवार, 23 सितंबर 2013

कूड़ाघर



क्या होता है प्यार ,नहीं पता हमें,
क्या होती है नफरत नहीं पता हमें
पूरा दिन गुज़रता है कचरा उठाने में
पूरी रात बीतती है एक रोटी की आस में
फिर वही सुबह आती है कूड़ों के ढेर से पटी
क्या होता है इन्सान नही पता हमें।

क्या होती है इच्छाएं,नहीं पता हमें,
क्या होती है ललक,नहीं पता हमें,
मलिन बस्तियों में ठिकाना है अपना
गन्दी नालियों की बदबू से वास्ता है अपना
कूड़ा बीनने के बाद भी हमे न किसी से गिला है
क्या होती है शिकायत,नहीं पता हमें।

क्या होता है सम्मान,नहीं पता हमें,
क्या होता है अपमान,नहीं पता हमें,
हर कोई हमसे दूर भागता है,
हर बार फटकार कर झिड़क दिया जाता है
हमे तो कूड़ा उठाना ही जीवन का उद्देश्य
लगता है
क्या होती है आदत,नहीं पता हमें।

क्या होता है शहर,नहीं पता हमें,
क्या होता है महल,नहीं पता हमे,
गलियों में हम करते हैं संघर्ष
कभी-2 तो फुटपाथ पर ही होती
है बसर
अपना तो घर ही कूड़ाघर होता है
क्या होता है देश,नहीं पता हमें।



हमे कोई अपना समझता ही नहीं !!



उदासियों से मेरा नाता भी टूटता नहीं,
ख़ुशी का एक पल भी मेरे लिए रुकता नहीं। 
हमे तो आता है अपनों का साथ निभाना,
पर हमे कोई अपना समझता ही नहीं। 

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

कुछ पल बनारस के :बनारस यात्रा




लखनऊ से चली ट्रेन अपने नियत समय से एक घंटे की देरी से अपने स्थान पर पहुँचने वाली थी सुबह के लगभग पांच बजे थे और मौसम हल्का ठंडा लग रहा था। मेरे साथ मेरे दो फ्रेंड और थे।सभी यात्रियों की नज़रें खिड़की के बाहर टिकी  थी। तभी हमे एक बोर्ड दिखता है जिस पर लिखा होता है-काशी जंक्शन। हमे यंही पर उतरना था। हम सभी ट्रेन से उतरने की तैयारी करने लगते हैं। लेकिन यह क्या !!! इतना साफ़ दिखा रहा मौसम अचानक बादलों से घिर जाता है और ताबड़तोड़ बारिश की बूंदे खिड़की से हमे भिगोने लगती हैं। हम लोग प्लेटफॉर्म पर उतरते हैं और भीगते-2 तीन शेड के नीचे खड़े हो जाते हैं। हमे अहसास हो रहा था कि मानो स्वयं महादेव अपनी नगरी में जलाभिषेक कर हमारा स्वागत कर रहे हों। बारिश कम होने पर हम तीनों स्टेशन से बाहर निकलते हैं और टिकने के लिए होटल ढूंढ़ते हैं। हमे स्टेशन के पास ही होटल मिल जाता है। हमे दो दिन बाद लखनऊ के लिए वापस निकलना था।इसलिए स्टेशन के पास ही होटल मिलने पर हमे ज्यादा असुविधा नहीं हुई। होटल पहुँचते ही हम लोग अपने रूम में जाते हैं। फ्रेश होने के बाद थोड़ा आराम करते हैं। और फिर नाश्ता करते हैं।
                               चूँकि मेरे एक फ्रेंड का काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू ) में इंटरव्यू था। इसलिए हम दोनों उसको बीएचयू में ड्राप करके काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए चल पड़ते हैं। ऑटो वाले के वंहा न जाने पर हमे डेढ़ किलोमीटर पैदल ही चलना पड़ता है। धीरे-2  हमे बल्लियों और उनके बीच में खड़े कांवड़ियों की लम्बी कतार दिखने लगती है। करीब आधा किलोमीटर और चलने के बाद हम ऐसी जगह पर पहुँच जाते हैं जहाँ बल्लियाँ ख़त्म होती हैं और कतार नीचे मंदिर के प्रांगण की तरफ जाती है। विपरीत दिशा से आ रही बल्लियाँ भी वंही ख़त्म हो रही थी। लेकिन उस कतार में भीड़ कम थी। इसलिए हम दोनों तुरंत प्रसाद,दूध,बेलपत्र लेते हैं और अपने सेलफोंस,डिजिटल कैमरा वगैरह लाकर में रखवाकर उसी कतार में लग जाते हैं। (इलेक्ट्रॉनिक डिवाईसेज़ को मंदिर में लाना वर्जित था )लेकिन दोपहर के बारह बज जाने के कारण मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं और हम दोनों लगभग एक घंटे तक वंही के वंही खड़े रहते हैं।
                                  सुबह की सुहावनी बारिश के बाद हमे अंदाज़ा नहीं था कि मौसम इतनी जल्दी करवट लेगा। हम दोनों काफी देर तक झुलसाती गर्मी में तपते रहें। शरीर का पूरा पानी पसीना बनकर हमे पूरा भिगो चुका था।ऐसा लग रहा था जैसे महादेव अपने दर्शन देने के लिए हमारी परीक्षा ले रहे हों। हमने एक छोटे लड़के को बीस रूपए देकर ठंडे पानी की बोतल लेन को कहा।वह मान गया। उसने आते ही हमे किनले की बोतल थमा दी और तब हमने अपना गला तर किया। कतार नीचे मंदिर की तरफ बढ़ने लगी थी और हम भी भारत में स्थित बारह जोतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए उत्साहित और लालायित थे। लोगों की सुरक्षा के लिए सिक्योरिटी टाइड थी।बल्लियों की कतार से लेकर मंदिर के अन्दर तक भारी संख्या में पुलिस बल तैनात था। मंदिर के प्रांगण में पहुँचते ही मंदिर का ऊपरी व मध्य भाग दिखाई देता है। मंदिर का ऊपरी भाग काफी लम्बा और हल्का गोलाई लिए त्रिभुजाकार है जो पूरा सोने(गोल्ड) से निर्मित है। मंदिर के गर्भगृह में काशी विश्वनाथ विश्राम करते हैं। शिवलिंग दर्शन व दूध चढ़ाने के बाद हम लोग प्रार्थना करते हैं और गर्भगृह से बाहर  आ जाते हैं। यह सब बहुत जल्दी हुआ। नंदी के कान में अपनी-2  इच्छा बताने के बाद हम दोनों वंहा स्थित अन्य मंदिरों की तरफ बढ़ते हैं। इन सब के बाद हम गंगा घाट (दशाश्वमेध घाट) की ओर प्रस्थान करते हैं। यह सोचकर कि वंहा डुबकी लगायेंगे लेकिन वंहा पहुँचने पर हमने पाया कि वंहा का नज़ारा तो कुछ और ही था। गंगा जी खतरे के निशान पर थी।सीढ़ियों से लगभग 30 मीटर की दूरी के बाद का क्षेत्र प्रतिबंधित था। लोग उसी दायरे में गंगा जी में स्नान कर रहे थे और पिपियों में जल भरकर ले जा रहे थे। हमने बारी-2 से गंगा नदी में प्रवेश किया और अर्ध्य देने के बाद चुल्लू में जल लेकर अपने ऊपर छिड़क लिया। (हमारे यंहा इसे स्नान के बराबर मान लिया जाता है) हम दोनों होटल वापस लौट आते हैं। शाम को तीनों फ्रेंड साथ बैठते हैं और अगले दिन की प्लानिंग करते हैं।
                                        अगले दिन सुबह दस बजे हम तीनो होटल छोड़ देते हैं और सारनाथ के लिए निकलते हैं। सारनाथ स्टेशन से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसी जगह पर गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। सारनाथ पहुँचने पर हम सबसे पहले म्यूजियम जाते हैं जहाँ पर सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया चक्र(अशोक चक्र),अशोक की लाट व कई प्राचीन मूर्तियाँ विद्यमान है। म्यूजियम के बाद हम सभी बुद्ध के मंदिर जाते है। अन्दर प्रवेश करते ही लगभग सौ मीटर दूर स्थित बुद्ध जी की लम्बी विशालकाय मूर्ति दिखती है। मूर्ति के पास ही एक मंदिर स्थापित है जिसे 'थाई मंदिर' के नाम से जाना जाता है। उसी के निकट बुद्ध की तीन-चार छोटी बड़ी प्रतिमाएं विद्यमान है। यंहा कुछ देर रुकने के बाद हम लोग सारनाथ का स्तूप देखने के लिए चल पड़ते हैं। टिकट लेने के बाद जैसे ही हम लोग अन्दर जाते हैं तो दूर से ही स्तूप दिखने लगता है। यह काफी बड़ा है। इसका आकार शिवलिंग के आकार से काफी मिलता जुलता है। यंहा घूमते-2 हमे लगभग एक घंटा लग गया। इसके बाद यंहा से निकलकर एक और मंदिर जाते हैं जिसे 'जापान का मंदिर' कहते हैं। मंदिर तो बहुत थे लेकिन पिछले तीन-चार घंटे से लगातार घूम रहे हम तीनों के शरीर में इतना सामर्थ्य नहीं बचा था कि आगे और चल सके। दोपहर का समय था और धुप भी बहुत तेज़ थी।इसलिए हम वंहा से ऑटो करके होटल वापस आ गए।
                                                        होटल में आराम करने के बाद शाम को तीनो लोग भैरव मंदिर के लिए निकलते हैं। चूँकि मेरे एक फ्रेंड का इंटरव्यू होने के कारण वह काशी विश्वनाथ जी के दर्शन नहीं कर पाया था। इसलिए भैरव दर्शन के उपरान्त हम तीनों फिर से काशी विश्वनाथ मंदिर गये। लेकिन हैरानी हो रही थी कि सावन के सोमवार पर चंद मिनटों में हमे शिवलिंग के दर्शन हो गए। आज भीड़ कल के मुकाबले काफी कम थी और कांवड़िएँ तो नदारद थे। हम मंदिर से गंगा घाट की तरफ बढ़ते हैं। शाम के छः बज चुके थे। गंगा आरती हो रही थी। हम भी उसमे सम्मिलित हुए और दीपदान भी किया। क्या दृश्य था ! क्या अनुभव था ! महादेव की इस नगरी में आकर मैं धन्य हो गया। और गंगा जी के स्पर्श से ही मैं सभी पापों से मुक्त हो गया। इन्ही सब विचारों से परिपूर्ण मेरा मन लौट आता है उस पटरी पर जहाँ से मेरी लखनऊ वापसी की ट्रेन गुजरने वाली थी। अब वह समय आ गया था जब मुझे बनारस को अलविदा कहना था। हम सब ट्रेन पर सवार हो गए थे। गाडी चल पड़ी थी। और कुछ समय बाद ही हमने बनारस पार कर लिया था।



                

सोमवार, 12 अगस्त 2013

दिल से चाहो,कायनात को मुट्ठी में करो




" अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है"इसे सिर्फ एक फिल्मी  डायलोग मत समझिये.यह लाइफ का सबसे बड़ा सच है.हमे हमेशा जिंदगी से से यह शिकायत रहती है कि हमें अपनी मेहनत का उचित फल नहीं मिलता.आज के भौतिकवादी युग में फल की आशा न करने का उपदेश देना बेईमानी होगी.लेकिन फल की चिंता करने से पहले हमे उस पेड़ की चाह करनी होगी जो भविष्य में आपको फल देने वाला है.हम मेहनत तो करते हैं लेकिन बेमन से.यदि आप दिल से किसी चीज़ को चाहते हैं और उसके लिए जी जान से मेहनत करते हैं.तो परिस्थितियां आपके अनुकूल हो जाएंगी और सारी दुनिया आपको आपकी सफलता से साक्षात्कार करा देगी.अगर आपके पास इसका एक भी रीज़न है कि आपको एस्ट्रोनॉट बनना है तो यकीन मानिये दुनिया आपको 100 रीज़न बता देगी कि हाँ आपको इसलिए एस्ट्रोनॉट बनना है.इसके विपरीत यदि आप सोचते हैं कि आप डॉक्टर नहीं बन पाएंगे और इसका एक रीज़न भी देते हैं तो दुनिया आपको डॉक्टर नहीं बन सकने के 100 रीज़न बता देगी.यंहा बात हमारी इच्छाशक्ति की है.यदि हम दृढ हैं और उस चीज़ को पाने के लिए ललायित हैं तो पूरी दुनिया आपको उस चीज़ से मिलाने के लिए तैयार हो जाती है.
                            जिस दिन आपने सोच लिया कि हाँ कुछ करना है,कुछ बनना है.मैं कुछ भी कर सकता हूँ.मेरे लिए सब आसान है.फिर आपको दुनिया की कोई भी ताकत आपको ऐसा करने से नहीं रोक सकती.यहाँ तक आप खुद भी चाहेंगे तो असफल रहेंगे.और फिर वह होगा जिसकी आपने कभी कल्पना नहीं की होगी.यू विल बी द लीडर देन.


                     
     
          

बुधवार, 17 जुलाई 2013

छोटे छोटे कदम से बढ़े सफलता की ओर




जिंदगी बहुत खूबसूरत है यदि उसे अपने हिसाब से जिया जाये.अपने हिसाब से जीने का मतलब यह कतई नहीं है कि हम बिना किसी किसी की परवाह किये भौतिक संसाधनों का उपयोग करने में लगे रहे बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम जीवन के हर पड़ाव में आने वाली प्रोब्लेम्स से बिना डरे उसे पार करे.यदि प्रॉब्लम ने आपको अपना गुलाम बना लिया तो आप उससे बाहर नहीं निकल पाएंगे और हार मान जायेंगे लेकिन यदि आप दृढ़ है और प्रॉब्लम को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहते तो आपको उस प्रॉब्लम का खुद ही हल निकालना होगा.तभी आप अपने बनाये गए लक्ष्य तक पहुँच पाएंगे.लक्ष्य छोटे-बड़े दोनों होते हैं.लक्ष्य जितने छोटे होते हैं,रास्ते में आने वाली मुश्किलें भी उतनी ही छोटी होती है.लक्ष्य जितने बड़े होते जाते है मुश्किलें भी उतनी ही विकराल होती जाती हैं.एक बड़े लक्ष्य को हम कई छोटे-२ भागों(लक्ष्यों) में बाँट सकते हैं.जिससे हमारी सफलता के चांसेस बढ़ जाते हैं.छोटे लक्ष्यों को प्राप्त करने में मुश्किलें भी छोटी होती है जिन्हें हम चुटकियों में हल कर सकते हैं और एक स्टेप आगे बढ़ कर अपने लक्ष्य के करीब पहुँच सकते हैं.
                            हमारी समस्या यह नहीं है कि हम बड़े लक्ष्य बनाकर भी उसे पाने में असफल हो जाते हैं बल्कि हमारी समस्या यह है कि हम बड़े लक्ष्य बनाकर एक बड़ा स्टेप लेने की सोचते हैं और करते भी हैं.जबकि हमे बेसिक स्टेप लेना होता है जो हमे बताता है कि किसी कार्य को करने से पहले उसकी बारीक जानकारी आवश्यक होती है.फिर उसके बाद छोटे-२ स्टेप उठाने होते हैं.फिर हम क्यूँ अपने लक्ष्य को पाने के लिए एकदम से बड़ा करने की सोचने लगते है.ये छोटे-२ स्टेप कब आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचा देंगे,आपको पता भी नहीं चलेगा.तो फिर देर किस बात की.बड़ा सोचिये,बड़ा लक्ष्य बनाइये लेकिन ध्यान रहे इसकी शुरुआत छोटे स्टेप से ही करें.

शुक्रवार, 28 जून 2013

उत्तराखंड:विकास या विनाश


उत्तराखंड में हुई भारी तबाही के बाद वंहा के तथा अन्य राज्यों के मंत्रियों ने पीड़ितों के लिए आर्थिक मदद करने की घोषणा की है.इनमे से कई मंत्री ऐसे हैं जो पिछले एक दशक से उत्तराखंड का विकास के नाम पर अंधाधुंध निर्माण करने में लगे थे.जिसमे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र की पूर्णतया उपेक्षा की गयी.परिणामस्वरूप कुदरत की इस विनाशलीला का कहर उत्तराखंड पर बरपा.इसे दैवीय आपदा कम मानवीय आपदा कहना उचित प्रतीत होता है क्योंकि इसका मुख्य कारण सरकार एवं प्रशासन की घोर लापरवाही है.यदि तथाकथित मानव कल्याण की योजनाओं के लिए पेड़ों की कटाई,नदियों,नहरों आदि का अतिक्रमण नहीं किया गया होता तो आज उत्तराखंड का यह हाल नहीं होता.इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि किसी क्षेत्र का विकास पर्यावरण की उपेक्षा पर किया जाता है तो प्रकृति का गुस्सा उस क्षेत्र को विनाश की कगार पर पहुंचा देगा.
                                                                                       

बर्बाद

इस कदर हमने खुद को कर लिया बर्बाद  फिर निकले नही जज़्बात कोई उसके जाने के बाद..!!