साहित्य समाज का आईना होता है.फिर क्यूँ इन साहित्यों को अपना उचित स्थान नहीं मिलता.मीडिया समाज के लोगों की सोच और उनके दृष्टिकोण को प्रभावित करती है.मीडिया के माध्यम से इन्हें बढ़ावा क्यों नहीं दिया जाता.प्रिंट मीडिया में दैनिक जागरण और जनसत्ता जैसे अख़बारों में अभी भी सप्ताह में एक दिन एक पेज पूरा साहित्य से सम्बंधित रहता है.लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दूरदर्शन और संसद के दोनों चैनलों को छोड़कर लगभग सभी चैनलों पर साहित्य का प्रचार एवं प्रदर्शन न के बराबर है.इन्हें तो राशिफल,भविष्यवाणी,आईपीएल से फुर्सत मिले तो साहित्य का प्रचार करे न.भारत में हिंदी,उर्दू,बंगला,तमिल और उड़िया साहित्यों की कमी नहीं हैं लेकिन इनमे परस्पर संवाद का सर्वथा अभाव है.एक भाषा की रचना का दूसरी भाषा में अनुवाद बहुत कम है.हिंदी भाषी पाठक को शायद ही किसी तमिल या उड़िया साहित्यकार का नाम पता हो.ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इन साहित्यों को पाठकों के करीब लाने में मददगार साबित हो सकता है.
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
बर्बाद
इस कदर हमने खुद को कर लिया बर्बाद फिर निकले नही जज़्बात कोई उसके जाने के बाद..!!
-
आज अखिलेश यादव सरकार यानि यूपी सरकार के एक साल पूरे हो गए.इसी के साथ शुरू हो गया है माननीय मुख्यमंत्री की विभिन्न क्षेत्रों में सफलता और...
-
आखिरकार बंगाल की जनता ने फिर एक बार अपनी 'दीदी' ममता बनर्जी पर विश्वास कर बंगाल की कमान उनके हाथों में सौंप दी। ममता बनर्जी लगातार त...
-
मुझे रुला कर वो अपनी कामयाबी समझते हैं एक हम हैं जो इसे भी उनकी नादानी समझते हैं...!!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें