शुक्रवार, 10 मई 2013

राष्ट्रगीत का बहिष्कार:देश का अपमान



भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में बसपा के वरिष्ठ सांसद शफीकुर्रहमान द्वारा राष्ट्रगीत 'वन्देमातरम' का बहिष्कार करना दुर्भाग्यपूर्ण एवं सर्वथा निंदनीय है.इस बात की निंदा वर्तमान व पूर्व लोक सभाध्यक्ष ने भी की.वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत घोषित करवाने में मौलाना आजाद का बहुत बड़ा हाथ था.क्या शफीकुर्रहमान मौलाना आजाद से भी बड़े नेता हैं.क्या उनका कद इतना बड़ा है कि जिस गीत के आगे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का सर सम्मान में झुक जाता है,उस गीत का वो अपमान कर सकते हैं.भारत की आज़ादी के लिए महान क्रांतिकारी अशफाक उल्लाखान वन्देमातरम कहते-2 फांसी पे चढ़ गए.क्या इन लोगों के इस्लाम और शफीकुर्रहमान के इस्लाम में कोई भिन्नता है.यंहा ये बताना ज़रूरी है की ये किसी धर्म विशेष या सम्मान का विषय नहीं है.ये विषय है देश के मान और अपमान का.अगर इस्लाम इन्हें ऐसा करने से रोकता है तो ये गीत शुरू होने के पहले ही बाहर जा सकते थे.संसद के हर सत्र का समापन राष्ट्रगीत से होता है.उन्हें अब क्यों याद आया कि राष्ट्रगीत गाना इस्लाम के विरुद्ध है.उन्हें संपूर्ण भारतीय जनता से देश के अपमान के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए. 

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बर्बाद

इस कदर हमने खुद को कर लिया बर्बाद  फिर निकले नही जज़्बात कोई उसके जाने के बाद..!!